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वन पर्व
अध्याय २५२
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द्रौपद्यु उवाच
यदा किरीटी परवीरघाती; निघ्नन्रथस्थो द्विषतां मनांसि |  १५   क
मदन्तरे त्वद्ध्वजिनीं प्रवेष्टा; कक्षं दहन्नग्निरिवोष्णगेषु ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति