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शान्ति पर्व
अध्याय १५१
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भीष्म उवाच
जानामि त्वामहं वाय़ो सर्वप्राणभृतां वरम् |  ४   क
वरिष्ठं च गरिष्ठं च क्रोधे वैवस्वतं यथा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति