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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
स धनुः सूतपुत्रस्य छित्त्वा ज्यां च सुसंशितः |  ५२   क
अपतद्भुवि निस्त्रिंशश्च्युतः सर्प इवाम्वरात् ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति