वन पर्व  अध्याय १५१

वैशम्पाय़न उवाच

वैडूर्यवरनालैश्च वहुचित्रैर्मनोहरैः |  ६   क
हंसकारण्डवोद्धूतैः सृजद्भिरमलं रजः ||  ६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति