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वन पर्व
अध्याय १५१
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वैशम्पाय़न उवाच
सेवितामृषिभिर्दिव्यां यक्षैः किम्पुरुषैस्तथा |  ८   क
राक्षसैः किंनरैश्चैव गुप्तां वैश्रवणेन च ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति