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शल्य पर्व
अध्याय ३८
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जनमेजय़ उवाच
कपालमोचनं व्रह्मन्कथं यत्र महामुनिः |  ८   क
मुक्तः कथं चास्य शिरो लग्नं केन च हेतुना ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति