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उद्योग पर्व
अध्याय १५१
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वैशम्पाय़न उवाच
यदर्थं वनवासश्च प्राप्तं दुःखं च यन्मय़ा |  २०   क
सोऽय़मस्मानुपैत्येव परोऽनर्थः प्रय़त्नतः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति