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स्त्री पर्व
अध्याय २
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विदुर उवाच
अशोचन्प्रतिकुर्वीत यदि पश्येत्पराक्रमम् |  १७   क
भैषज्यमेतद्दुःखस्य यदेतन्नानुचिन्तय़ेत् |  १७   ख
चिन्त्यमानं हि न व्येति भूय़श्चापि विवर्धते ||  १७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति