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द्रोण पर्व
अध्याय १५१
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिंस्तथा वर्तमाने कर्णराक्षसय़ोर्मृधे |  १   क
अलाय़ुधो राक्षसेन्द्रो वीर्यवानभ्यवर्तत ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति