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द्रोण पर्व
अध्याय १५१
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सञ्जय़ उवाच
त्वां पुरस्कृत्य सगणं वय़ं योत्स्यामहे परान् |  ११   क
न हि वैरान्तमनसः स्थास्यन्ति मम सैनिकाः ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति