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विराट पर्व
अध्याय १७
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द्रौपद्यु उवाच
मत्स्यराज्ञः समक्षं च तस्य धूर्तस्य पश्यतः |  ५   क
कीचकेन पदा स्पृष्टा का नु जीवेत मादृशी ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति