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द्रोण पर्व
अध्याय १५१
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सञ्जय़ उवाच
तस्यापि तुरगाः शीघ्रा हस्तिकाय़ाः खरस्वनाः |  १५   क
शतं युक्ता महाकाय़ा मांसशोणितभोजनाः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति