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द्रोण पर्व
अध्याय १५१
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सञ्जय़ उवाच
तस्यापि रथनिर्घोषो महामेघरवोपमः |  १६   क
तस्यापि सुमहच्चापं दृढज्यं वलवत्तरम् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति