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द्रोण पर्व
अध्याय १५१
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सञ्जय़ उवाच
तस्यापि गोमाय़ुवडाभिगुप्तो; वभूव केतुर्ज्वलनार्कतुल्यः |  १८   क
स चापि रूपेण घटोत्कचस्य; श्रीमत्तमो व्याकुलदीपितास्यः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति