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द्रोण पर्व
अध्याय १५१
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सञ्जय़ उवाच
दीप्ताङ्गदो दीप्तकिरीटमाली; वद्धस्रगुष्णीषनिवद्धखड्गः |  १९   क
गदी भुशुण्डी मुसली हली च; शरासनी वारणतुल्यवर्ष्मा ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति