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आदि पर्व
अध्याय १५२
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वैशम्पाय़न उवाच
तेन शव्देन वित्रस्तो जनस्तस्याथ रक्षसः |  १   क
निष्पपात गृहाद्राजन्सहैव परिचारिभिः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति