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द्रोण पर्व
अध्याय १२०
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सञ्जय़ उवाच
यत्तु शक्तिमता कार्यं सततं हितकारिणा |  २८   क
तत्करिष्यामि कौरव्य जय़ो दैवे प्रतिष्ठितः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति