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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतत्ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि |  ३७   क
धौन्धुमारमुपाख्यानं प्रथितं यस्य कर्मणा ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति