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अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षत्रधर्मरतः पार्थ पितॄन्देवांश्च तर्पय़ |  ७   क
श्रेय़सा योक्ष्यसे चैव व्येतु ते मानसो ज्वरः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति