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अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
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वैशम्पाय़न उवाच
रञ्जय़स्व प्रजाः सर्वाः प्रकृतीः परिसान्त्वय़ |  ८   क
सुहृदः फलसत्कारैरभ्यर्चय़ यथार्हतः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति