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अनुशासन पर्व
अध्याय १५२
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वैशम्पाय़न उवाच
अनु त्वां तात जीवन्तु मित्राणि सुहृदस्तथा |  ९   क
चैत्यस्थाने स्थितं वृक्षं फलवन्तमिव द्विजाः ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति