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वन पर्व
अध्याय १५२
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वैशम्पाय़न उवाच
वातेन कुन्त्यां वलवान्स जातः; शूरस्तरस्वी द्विषतां निहन्ता |  १७   क
सत्ये च धर्मे च रतः सदैव; पराक्रमे शत्रुभिरप्रधृष्यः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति