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वन पर्व
अध्याय १५२
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वैशम्पाय़न उवाच
तेषां वचस्तत्तु निशम्य देवः; प्रहस्य रक्षांशि ततोऽभ्युवाच |  २४   क
गृह्णातु भीमो जलजानि कामं; कृष्णानिमित्तं विदितं ममैतत् ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति