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वन पर्व
अध्याय ६५
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वृहदश्व उवाच
जनित्र्यै प्रेषय़ामास सैरन्ध्री रुदते भृशम् |  ३२   क
व्राह्मणेन समागम्य तां वेद यदि मन्यसे ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति