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कर्ण पर्व
अध्याय ४७
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सञ्जय़ उवाच
आमन्त्रय़े त्वां व्रूहि जय़ं रणे मे; पुरा भीमं धार्तराष्ट्रा ग्रसन्ते |  १४   क
सौतिं हनिष्यामि नरेन्द्रसिंह; सैन्यं तथा शत्रुगणांश्च सर्वान् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति