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विराट पर्व
अध्याय १
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अर्जुन उवाच
न दुःखमुचितं किञ्चिद्राजन्वेद यथा जनः |  १८   क
स इमामापदं प्राप्य कथं घोरां तरिष्यसि ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति