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वन पर्व
अध्याय २९६
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो युधिष्ठिरो राजा नकुलं वाक्यमव्रवीत् |  ५   क
आरुह्य वृक्षं माद्रेय़ निरीक्षस्व दिशो दश ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति