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शान्ति पर्व
अध्याय १४७
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भीष्म उवाच
स्वकर्माण्यभिसन्धाय़ नाभिनन्दति मे मनः |  ३   क
प्राप्तं नूनं मय़ा घोरं भय़ं वैवस्वतादपि ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति