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द्रोण पर्व
अध्याय १५२
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सञ्जय़ उवाच
ततः कर्णं समुत्सृज्य भैमसेनिरपि प्रभो |  १४   क
प्रत्यमित्रमुपाय़ान्तं मर्दय़ामास मार्गणैः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति