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वन पर्व
अध्याय ६७
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वृहदश्व उवाच
ख्यातः प्राज्ञः कुलीनश्च सानुक्रोशश्च त्वं सदा |  १४   क
संवृत्तो निरनुक्रोशः शङ्के मद्भाग्यसङ्क्षय़ात् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति