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द्रोण पर्व
अध्याय १५२
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सञ्जय़ उवाच
गदाविमुक्तौ तौ भूय़ः समासाद्येतरेतरम् |  ४४   क
मुष्टिभिर्वज्रसंह्रादैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति