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द्रोण पर्व
अध्याय १५२
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सञ्जय़ उवाच
चुक्रुशुर्नेदमस्तीति द्रोणद्रौणिकृपादय़ः |  ६   क
तत्कर्म दृष्ट्वा सम्भ्रान्ता हैडिम्वस्य रणाजिरे ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति