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शान्ति पर्व
अध्याय १८५
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भृगुरु उवाच
इह चिन्ता वहुविधा धर्माधर्मस्य कर्मणः |  १६   क
यस्तद्वेदोभय़ं प्राज्ञः पाप्मना न स लिप्यते ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति