अनुशासन पर्व  अध्याय १५३

वैशम्पाय़न उवाच

युधिष्ठिरोऽहं नृपते नमस्ते जाह्नवीसुत |  १९   क
शृणोषि चेन्महावाहो व्रूहि किं करवाणि ते ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति