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अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
न शोचितव्यं कौरव्य भवितव्यं हि तत्तथा |  ३२   क
श्रुतं देवरहस्यं ते कृष्णद्वैपाय़नादपि ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति