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शान्ति पर्व
अध्याय १६०
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वैशम्पाय़न उवाच
अत्र मे संशय़श्चैव कौतूहलमतीव च |  ५   क
किं स्वित्प्रहरणं श्रेष्ठं सर्वय़ुद्धेषु पार्थिव ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति