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अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
अनुजानीहि मां कृष्ण वैकुण्ठ पुरुषोत्तम |  ३८   क
रक्ष्याश्च ते पाण्डवेय़ा भवान्ह्येषां पराय़णम् ||  ३८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति