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अनुशासन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
व्राह्मणाश्चैव ते नित्यं प्राज्ञाश्चैव विशेषतः |  ५०   क
आचार्या ऋत्विजश्चैव पूजनीय़ा नराधिप ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति