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द्रोण पर्व
अध्याय १२६
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सञ्जय़ उवाच
एष त्वहमनीकानि प्रविशाम्यरिसूदन |  ३७   क
रणाय़ महते राजंस्त्वय़ा वाक्षल्यपीडितः ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति