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वन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
वहन्तु राक्षसा विप्रान्यथाश्रान्तान्यथाकृशान् |  १७   क
त्वमप्यमरसङ्काश वह कृष्णां घटोत्कच ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति