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वन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो वाय़ुर्महाञ्शीघ्रो नीचैः शर्करकर्षणः |  २   क
प्रादुरासीत्खरस्पर्शः सङ्ग्राममभिचोदय़न् ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति