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वन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
तं दृष्ट्वा धर्मराजस्तु परिष्वज्य पुनः पुनः |  २६   क
उवाच श्लक्ष्णय़ा वाचा कौन्तेय़ किमिदं कृतम् ||  २६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति