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वन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
साहसं वत भद्रं ते देवानामपि चाप्रिय़म् |  २७   क
पुनरेवं न कर्तव्यं मम चेदिच्छसि प्रिय़म् ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति