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वन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
अनुशास्य च कौन्तेय़ं पद्मानि प्रतिगृह्य च |  २८   क
तस्यामेव नलिन्यां ते विजह्रुरमरोपमाः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति