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वन पर्व
अध्याय १५३
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वैशम्पाय़न उवाच
ते दृष्ट्वा धर्मराजानं देवर्षिं चापि लोमशम् |  ३०   क
नकुलं सहदेवं च तथान्यान्व्राह्मणर्षभान् |  ३०   ख
विनय़ेनानताः सर्वे प्रणिपेतुश्च भारत ||  ३०   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति