वन पर्व  अध्याय १५३

वैशम्पाय़न उवाच

निर्घातश्चाभवद्भीमो भीमे विक्रममास्थिते |  ४   क
चचाल पृथिवी चापि पांसुवर्षं पपात च ||  ४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति