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द्रोण पर्व
अध्याय १०३
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सञ्जय़ उवाच
द्रोणस्तु सत्वरो राजन्क्षिप्तो भीमेन संय़ुगे |  १६   क
रथमन्यं समास्थाय़ व्यूहद्वारमुपाय़यौ ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति