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द्रोण पर्व
अध्याय १५३
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सञ्जय़ उवाच
ततो दीप्ताग्निसङ्काशां शतघण्टामलङ्कृताम् |  १३   क
चिक्षेप समरे तस्मै गदां काञ्चनभूषणाम् ||  १३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति