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द्रोण पर्व
अध्याय १५३
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सञ्जय़ उवाच
स समास्थाय़ माय़ां तु ववर्ष रुधिरं वहु |  १६   क
विद्युद्विभ्राजितं चासीत्तिमिराभ्राकुलं नभः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति