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द्रोण पर्व
अध्याय १५३
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सञ्जय़ उवाच
तां प्रेक्ष्य विहितां माय़ां राक्षसो राक्षसेन तु |  १८   क
ऊर्ध्वमुत्पत्य हैडिम्वस्तां माय़ां माय़यावधीत् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति